मैं चल सकता नही सड़क पर होकर निडर,
फ़िर भी मुझे गर्व है अपने देश पर।
न कीमत है आदमी के ईमान की,
न परवाह किसी को आदमी की जान की।
न क़द्र किसी को रहीम की ,
और न श्रद्धा किसी को राम की
शर्मिंदा है ख़ुद यहाँ इश्वर ।
मैं चल सकता नही......
मैं जीवित भी हूँ, मैं मरा भी हूँ,
मैं क्रोधित भी हूँ , मैं डरा भी हूँ,
यह कैसा गणतंत्र है की हर जगह आतंक है
भयभीत है हर मनुष्य फिर भी कहते है की हम स्वतंत्र हैं ।
यह देश जा रहा है किधर
मैं चल सकता नही.........
ए मेरे देश के ठेकेदारों येही है मेरी तुमसे विनती
की धूमिल न हो हमारी यह संस्कृति।
खुशी हो हर चेहरे पे, हर आंखों में विश्वास हो,
हर मनुष्य निडर हो , हर ह्रदय में सत्य का वास हो.
और मैं कह सकू अपना सर ऊपर कर,
हाँ मुझे गर्व है अपने देश पर .
Tuesday, August 25, 2009
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